Monday, 29 January 2018

तुम  जन जन के बापू थे !

तुम ने   अपनी  कर्म-ज्योति  से, जन्मभूमि  उद्वीपत  की,
ममता  के  प्रिय भाव जगाकर, सारे   जग को  सन्मति  दी  !

जब  तुम   थे  तब मानवता  थी, आज  उसे  वह  ठौर  कहाँ  ? 
नर-नारी  सब  व्याकुल  हैं अति, रात्रि उन्हें, अब भोर  कहाँ  ?

जब  तुम   थे   तब   धर्म   यहां था, राम  नामका  नारा  था,
नम्र     भाव   इसलिए   तुम्हारा,   जन  मन  को  प्यारा था !

केवल   ना    तुम    हिंदु    थे,   जाति -जाति   के  रक्षक  थे,
बापू    तुम    सिद्धांत     प्रचारक ,सत्य  प्रिय   अहिंसक  थे !

पूज्य  आपकी   राह  पे  चलने की  आज  प्रतिज्ञा  करते  हैं,
थे   वो   जो    सिद्धांत    तुम्हारे, सादर  हिय  में    भरते  हैं !
                                    ***
-कृष्णकांत  भाटिया  'कान्त '



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