ग़ज़ल
आँसू यूँ ही नहीं उभरते आँखों में,
दर्द सहना पड़ता है डूबती सांसों में।
आसाँ नहीं है ,कश्ती को संभालना,
समंदर मचलता है,जब तूफानों में।
जगह दी है हमने, गैरों को दिलों में,
टीस सी उठती है, उन्हीं मकामों में।
गर जगह मिलेगी तो समा जाएँगे ,
शमा पे जलनेवाले इन परवानों में।
परदानशीन को भी पहचान लेते है,
तभी तो गिनती होती है,दीवानों में !
***
-अजित मानसत्ता
आँसू यूँ ही नहीं उभरते आँखों में,
दर्द सहना पड़ता है डूबती सांसों में।
आसाँ नहीं है ,कश्ती को संभालना,
समंदर मचलता है,जब तूफानों में।
जगह दी है हमने, गैरों को दिलों में,
टीस सी उठती है, उन्हीं मकामों में।
गर जगह मिलेगी तो समा जाएँगे ,
शमा पे जलनेवाले इन परवानों में।
परदानशीन को भी पहचान लेते है,
तभी तो गिनती होती है,दीवानों में !
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-अजित मानसत्ता
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