अखबार !
रोज सुबह अख़बार मेरे घर, खून में लथपथ आता है,
कहीं ज़ुर्म तो कहीं दुर्घटना की खबरें मुझे सुनाता है।
जोर की हँसी संपादक की ,छेड़छाड़ करती है जेहन से,
जामे -जमशेद नहीं, वो विष का प्याला पिलाता है।
जुलूस निकलते हैं दागी नेताओं के पहले पन्ने पर,
पढ़नेवाला ; सत्य मेव जयते को, ढूँढते रह जाता है।
कहीं किसीका घर ढलता है, इज्ज़त होती है शर्मसार,
विच्छिन घटनाओं को, हेडलाइनमें ही वो लगाता है।
थुक्का फ़जीहत की बोलबाला , करती है जानिबदारी ,
कॉर्पोरेट जग का अफ़सर , मर्जी से लेखिनी चलाता है।
संवाददाता सिकुड़ जाते हैं , मालिकों की ताबेदारी में ,
लिखना कुछ है ; लेकिन कुछ और ही वो लिखाता है।
करना क्या ? जीना मरना यहाँ , ऐसी ही खबरें पढ़ना,
घुटने टेकना; कोई चारा नहीं, ये ही भाग्यविधाता है।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
(पहली पंक्ति गुलज़ार की है )
रोज सुबह अख़बार मेरे घर, खून में लथपथ आता है,
कहीं ज़ुर्म तो कहीं दुर्घटना की खबरें मुझे सुनाता है।
जोर की हँसी संपादक की ,छेड़छाड़ करती है जेहन से,
जामे -जमशेद नहीं, वो विष का प्याला पिलाता है।
जुलूस निकलते हैं दागी नेताओं के पहले पन्ने पर,
पढ़नेवाला ; सत्य मेव जयते को, ढूँढते रह जाता है।
कहीं किसीका घर ढलता है, इज्ज़त होती है शर्मसार,
विच्छिन घटनाओं को, हेडलाइनमें ही वो लगाता है।
थुक्का फ़जीहत की बोलबाला , करती है जानिबदारी ,
कॉर्पोरेट जग का अफ़सर , मर्जी से लेखिनी चलाता है।
संवाददाता सिकुड़ जाते हैं , मालिकों की ताबेदारी में ,
लिखना कुछ है ; लेकिन कुछ और ही वो लिखाता है।
करना क्या ? जीना मरना यहाँ , ऐसी ही खबरें पढ़ना,
घुटने टेकना; कोई चारा नहीं, ये ही भाग्यविधाता है।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
(पहली पंक्ति गुलज़ार की है )
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