ग़ज़ल
गैर से मोतियों की भीख ना मांग ,
अपनी झोली की कदर कर बाबा.
पता पूछते फिरोगे कब तक रब का ?
घूँघट का पट खोल, सबर कर बाबा.
आगाज़ ही पे, तेरी निगाहें बशर कर ,
अंजाम छोड़ खुदा पे, जिगर कर बाबा.
तेरा इन्तज़ार खत्म हो जाएगा पल में,
साफ़ -सुथरी मन की डगर कर बाबा.
चन्द अयाम की बरसात से तू न उभरे,
पी जा दरिया, खुद को समंदर कर बाबा.
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
गैर से मोतियों की भीख ना मांग ,
अपनी झोली की कदर कर बाबा.
पता पूछते फिरोगे कब तक रब का ?
घूँघट का पट खोल, सबर कर बाबा.
आगाज़ ही पे, तेरी निगाहें बशर कर ,
अंजाम छोड़ खुदा पे, जिगर कर बाबा.
तेरा इन्तज़ार खत्म हो जाएगा पल में,
साफ़ -सुथरी मन की डगर कर बाबा.
चन्द अयाम की बरसात से तू न उभरे,
पी जा दरिया, खुद को समंदर कर बाबा.
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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