हम
यादों की गलियों में , घूमने निकले थे हम ,
इन सुनहरी पलों को, चूमने निकले थे हम।
वो नदी का किनारा, वो थिरकती हवाऍ ,
श्र्वेत -धवल चाँदनी , हमें देखकर मुस्कुराए।
बस ऐसे ही लम्हों में झूमने निकले थे हम।
इन सुनहरी पलों को , चूमने निकले थे हम।
असीरों की कसम देते थे , लेते थे उन दिनों,
कहते थे ; हमनवाओं के धागों से दिल बुनो।
दिलेपूर आरज़ू ,दिल खराश ढूँढने निकले थे हम।
इन सुनहरी पलों को , चूमने निकले थे हम।
अतीत के अंजुमन में , इश्क़े मिज़ाज़ी सुनाई ,
कुछ खट्टी ;कुछ मीठी ,ग़ज़लें मन में गुनगुनाईं।
अपनेआप को अपने से, भूलने निकले थे हम।
इन सुनहरी पलों को , चूमने निकले थे हम।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
यादों की गलियों में , घूमने निकले थे हम ,
इन सुनहरी पलों को, चूमने निकले थे हम।
वो नदी का किनारा, वो थिरकती हवाऍ ,
श्र्वेत -धवल चाँदनी , हमें देखकर मुस्कुराए।
बस ऐसे ही लम्हों में झूमने निकले थे हम।
इन सुनहरी पलों को , चूमने निकले थे हम।
असीरों की कसम देते थे , लेते थे उन दिनों,
कहते थे ; हमनवाओं के धागों से दिल बुनो।
दिलेपूर आरज़ू ,दिल खराश ढूँढने निकले थे हम।
इन सुनहरी पलों को , चूमने निकले थे हम।
अतीत के अंजुमन में , इश्क़े मिज़ाज़ी सुनाई ,
कुछ खट्टी ;कुछ मीठी ,ग़ज़लें मन में गुनगुनाईं।
अपनेआप को अपने से, भूलने निकले थे हम।
इन सुनहरी पलों को , चूमने निकले थे हम।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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