Saturday, 31 March 2018

हम  

यादों   की   गलियों   में  , घूमने   निकले  थे  हम ,
इन   सुनहरी  पलों    को,  चूमने  निकले  थे  हम। 

वो   नदी   का   किनारा,   वो    थिरकती     हवाऍ ,
श्र्वेत -धवल   चाँदनी ,   हमें   देखकर   मुस्कुराए। 

बस  ऐसे   ही  लम्हों  में   झूमने   निकले थे  हम।  
इन  सुनहरी    पलों   को , चूमने  निकले  थे  हम। 

असीरों  की   कसम   देते  थे , लेते  थे  उन  दिनों,
कहते  थे ; हमनवाओं  के   धागों  से    दिल  बुनो। 

दिलेपूर आरज़ू ,दिल खराश  ढूँढने निकले थे  हम। 
इन   सुनहरी    पलों    को , चूमने  निकले  थे हम। 

अतीत  के   अंजुमन  में , इश्क़े   मिज़ाज़ी  सुनाई ,
कुछ  खट्टी ;कुछ मीठी ,ग़ज़लें  मन  में गुनगुनाईं। 

अपनेआप   को   अपने से, भूलने  निकले  थे हम। 
इन  सुनहरी  पलों    को ,   चूमने निकले  थे  हम। 
                                 ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '















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