Thursday, 16 May 2019

ग़ज़ल 

वक्त ने सुर्ख  फूलों से  रेत पे हमारा नाम  लिखा  है,
अंजुमन  में हमने  होठों  पर अपने,  जाम  रखा  है। 

की  जमाने की   बेरुखी  ने  हमें  बरबाद कर दिया,
जामे  ऐश  को  हमने बहते  आँसुओं  से  चखा  है। 

सिरहाज     करवटें   बदलता    रहता   है  रातभर,
क्या  यही   तुम्हारी  मुहब्बत ,क्या  यही  वफ़ा  है ?

नशेमन  को   छोड़कर  परिंदे  भी  उड़  गए  आज,
दिल-खराश , ये  कायनात ,क्यों  हमसे   खफ़ा  है ?

सज़ा   दे  दो , कैद  में  डाल   दो, शूली पे चड़ा  दो,
रुखसत  से पहले   बता  दो, ये   कौनसी दफ़ा  है ?

कुछ   शायरी ,चंद  शेर ,ग़ज़लें  भी  लिखीं  हमने,
इज्जत  तो   मिली,बंदिशों  ने की हमपे  जफ़ा है। 

हमनवाओंमे  घूमते  रहे, दिलेपूर  आरज़ू  लेकर,
घाटा  नहीं,शब्द की दुनिया में  नफ़ा ही नफ़ा  है। 
                               ***
-कृष्णकांत  भाटिया 'कान्त '



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