प्रणाम करूं !
भारतमाता के चरणों में , पहले मैं प्रणाम करूं ,
सत्ता है सेवाका स्त्रोत, हर वक्त यही ध्यान करूं।
गंगा-जमुना जैसा पावन, चरित्र बना रहे मेरा,
गीता-रामायण-रामचरित मानसका , संधान करूं।
जाँ-फ़िशानी देश के लिए, यही लक्ष्य है विराट,
अर्ध्य-अर्चन -अर्करेजी,अवधारण का अरमान करूं।
भरोशा जताया है मुझपे , दुबारा देश की जनता ने,
अलौकिक इस घड़ी का मैं हंमेशा सम्मान करूं।
नरेंद्र ,चौकीदार इस राष्ट्र की अनमोल विरासत का,
दुश्मनों से लड़ने के लिए, सज्ज तीर-कमान करूं।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
भारतमाता के चरणों में , पहले मैं प्रणाम करूं ,
सत्ता है सेवाका स्त्रोत, हर वक्त यही ध्यान करूं।
गंगा-जमुना जैसा पावन, चरित्र बना रहे मेरा,
गीता-रामायण-रामचरित मानसका , संधान करूं।
जाँ-फ़िशानी देश के लिए, यही लक्ष्य है विराट,
अर्ध्य-अर्चन -अर्करेजी,अवधारण का अरमान करूं।
भरोशा जताया है मुझपे , दुबारा देश की जनता ने,
अलौकिक इस घड़ी का मैं हंमेशा सम्मान करूं।
नरेंद्र ,चौकीदार इस राष्ट्र की अनमोल विरासत का,
दुश्मनों से लड़ने के लिए, सज्ज तीर-कमान करूं।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
No comments:
Post a Comment