Sunday, 19 May 2019

प्रणाम  करूं  !

भारतमाता   के   चरणों  में , पहले मैं  प्रणाम  करूं ,
सत्ता  है  सेवाका  स्त्रोत, हर वक्त यही ध्यान करूं। 

गंगा-जमुना  जैसा   पावन,  चरित्र  बना  रहे   मेरा,
गीता-रामायण-रामचरित मानसका , संधान  करूं। 

जाँ-फ़िशानी   देश  के  लिए,  यही  लक्ष्य  है  विराट,
अर्ध्य-अर्चन -अर्करेजी,अवधारण का  अरमान करूं। 

भरोशा जताया  है  मुझपे , दुबारा  देश की जनता ने,
अलौकिक   इस  घड़ी  का  मैं  हंमेशा  सम्मान  करूं। 

नरेंद्र ,चौकीदार  इस राष्ट्र की अनमोल विरासत का,
दुश्मनों से  लड़ने  के  लिए, सज्ज  तीर-कमान करूं।  
                                 ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '

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