Sunday, 5 May 2019

ग़ज़ल 

चले  थे  ,उजाले   समेट   कर  अपने,
झगमगा  रहे    थे ,तगाफूल    सपने।

सफर  था  सुहाना, घड़ी  बे-खबर थी,
सजाकर  नशेमन, जमीन पर रखने। 

गनीमत-सबा  भी , चली   थी  सबेरे,
बुतक़दे  लगे   थे, हरि   नाम   रटने। 

परिंदा  उड़ा  था,  अकेला  चमन  में,
लगी थी , दयानत  सरेआम   कटने। 

फली  है  -लची  है ,ऋतू  ये  सुहानी,
चलो भी  चलो ही ,चलें आम चखने। 
                     ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '









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