ग़ज़ल
चले थे ,उजाले समेट कर अपने,
झगमगा रहे थे ,तगाफूल सपने।
सफर था सुहाना, घड़ी बे-खबर थी,
सजाकर नशेमन, जमीन पर रखने।
गनीमत-सबा भी , चली थी सबेरे,
बुतक़दे लगे थे, हरि नाम रटने।
परिंदा उड़ा था, अकेला चमन में,
लगी थी , दयानत सरेआम कटने।
फली है -लची है ,ऋतू ये सुहानी,
चलो भी चलो ही ,चलें आम चखने।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
चले थे ,उजाले समेट कर अपने,
झगमगा रहे थे ,तगाफूल सपने।
सफर था सुहाना, घड़ी बे-खबर थी,
सजाकर नशेमन, जमीन पर रखने।
गनीमत-सबा भी , चली थी सबेरे,
बुतक़दे लगे थे, हरि नाम रटने।
परिंदा उड़ा था, अकेला चमन में,
लगी थी , दयानत सरेआम कटने।
फली है -लची है ,ऋतू ये सुहानी,
चलो भी चलो ही ,चलें आम चखने।
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-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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