गज़ल
दिल तोड़ना न था तोड़ना पड़ा,
रिश्ता जोड़ना न था जोड़ना पड़ा !
तुम नज़र आये एक एक लब्ज़ में,
कुछ बोलना न था बोलना पड़ा !
कितने छिपाये राज़ अपने भीतर,
खुदको खोलना न था खोलना पड़ा !
थीं अभी तक जो कुंवारीं चिटठियाँ,
तुम्हें देने दौड़ना न था दौड़ना पड़ा !
'फलक' होठों में दबी आवाज़ हुँ मैं ,
कुछ भी छोड़ना न था छोड़ना पड़ा !
-कृष्णकांत भाटिया 'फलक'
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