ग़ज़ल
ग़र तू चल शके तो; मेरे साथ साथ चल,
ख़ुशी से मचल शके तो; मेरे साथ साथ चल !
चलना अकेले कभी मेरी फ़ितरत ही नहीं ,
रह तू अटल शके तो; मेरे साथ साथ चल !
फिहरिस्त दर्द की मेरी लंबी है देखना,
अँधेरे में सँभल शके तो; मेरे साथ साथ चल !
बचपन से जवानी ; जवानी से ये बुढ़ापा,
तू कँवल बन शके;तो मेरे साथ साथ चल !
जिया है हर लम्हा ; मैंने बनके पंचानन,
कटिबद्ध निकल शके तो;मेरे साथ साथ चल !
दुलराना बहुत अच्छा लगता है मुझको,
65 -11 में बदल शके तो;मेरे साथ साथ चल !
***
-'कान्त '
ग़र तू चल शके तो; मेरे साथ साथ चल,
ख़ुशी से मचल शके तो; मेरे साथ साथ चल !
चलना अकेले कभी मेरी फ़ितरत ही नहीं ,
रह तू अटल शके तो; मेरे साथ साथ चल !
फिहरिस्त दर्द की मेरी लंबी है देखना,
अँधेरे में सँभल शके तो; मेरे साथ साथ चल !
बचपन से जवानी ; जवानी से ये बुढ़ापा,
तू कँवल बन शके;तो मेरे साथ साथ चल !
जिया है हर लम्हा ; मैंने बनके पंचानन,
कटिबद्ध निकल शके तो;मेरे साथ साथ चल !
दुलराना बहुत अच्छा लगता है मुझको,
65 -11 में बदल शके तो;मेरे साथ साथ चल !
***
-'कान्त '
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