Thursday, 17 November 2016

ग़ज़ल 

ग़र  तू   चल  शके  तो; मेरे  साथ  साथ  चल,
ख़ुशी  से मचल शके तो; मेरे साथ साथ  चल !

चलना  अकेले  कभी  मेरी  फ़ितरत  ही नहीं ,
रह  तू  अटल  शके  तो; मेरे साथ  साथ चल !

फिहरिस्त  दर्द   की   मेरी    लंबी  है  देखना,
अँधेरे में  सँभल शके तो; मेरे साथ साथ चल !

बचपन  से   जवानी ; जवानी  से  ये  बुढ़ापा,
तू    कँवल  बन  शके;तो मेरे साथ साथ चल !

जिया  है   हर  लम्हा ; मैंने  बनके  पंचानन,
कटिबद्ध निकल शके तो;मेरे साथ साथ चल !

दुलराना   बहुत   अच्छा   लगता  है  मुझको,
65 -11 में बदल शके तो;मेरे साथ साथ  चल !
                             ***
-'कान्त '

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