Monday, 21 November 2016

बारहमासी  है  !

भूल भुलैयां  जीवनकी , इस  कदर  सताती  हैं ,
कानी  ऊँगली  पर  हम  सबको  वे  नचाती  हैं। 

चलना,गिरना,गिरकर सँभलना लगा रहता है,
निबिड़  अँधेरे में भी, प्रकाश स्वत :मिलता है। 

सौदामिनी  चमककर , आसमान  सजाती  है, 
उमड़ घुमड़कर बदरी ,अमृत  जल बरसाती है। 

इन्सान  बहेलिया  बनकर  जाल  बिछाता  है,
अपने  चक्रव्यूह में खुद फँसकर  रह जाता है। 

मातमपुरसी ,आज  शब्दों  से  ही  दी जाती है,
जनाज़े  से निकलकर,शादी में आती जाती है। 

कलापी अपने पँख  फैलाकर, नाच रचाता  है,
मधुर  केकारव  से,वह  बादलों को बुलाता है। 

हिकमत ही जीवन नौकाको किनारे लाती  है,
'कान्त 'की  कविता ,रिमझिम बारहमासी है। 
                            ***
-'कान्त '





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