Wednesday, 2 November 2016

गीत 

प्रभु  ! जैसा  हुँ  वैसा ही  मुझको  स्वीकार  करो !
आशाओंके  दीप  जलाये,उसको  अंगीकार करो !

नई  दिशाएँ ,नई  नवेली  लहरें  आज़  डोल  रहीं,
मेरे  अडग  संकल्पोंको  तराजू में  वे  तोल  रहीं। 

अँधेरे में  डगमग  चलते  पैरों  को  आधार  करो !
प्रभु ! जैसा  हुँ  वैसा  ही   मुझको  स्वीकार  करो !

एक  बार फिर  नया  सवेरा  मेरे जीवन में आया,
ढेर   सारी  खुशियों  को  वह  अपने  संग  लाया।

मेरी आँगन- बगिया में शबनम की  बौछार करो !
प्रभु ! जैसा  हुँ   वैसा  ही  मुझको  स्वीकार करो !

टिम -टिम  करते  तारे , सुहाते   नील गगन में ,
प्रकाश -पुंज  छिपा  है , मेरी  भीतरी  अगन में। 

भटक न जाऊँ  मैं डगर में,  प्रज्ञा का प्रहार करो !
प्रभु, जैसा  हुँ   वैसा  ही  मुझको  स्वीकार  करो !
                             ***
-'कान्त'


No comments:

Post a Comment