Sunday, 27 November 2016

ग़ज़ल 

खुद  ही  हँसता  हूँ ,खुद  ही  रो  लेता  हूँ ,
वक़ूफ़  अपने  मन   को ,हरदम देता  हूँ  !

मुझ  से  मत पूछो, हड़कंप  के  बारे  में ,
भीतर ही  भीतर ,मैं  सब कुछ सहता हूँ !

प्यार  किया  है  मैंने,  खेल  नहीँ  खेला ,
तेरी  चाहत  में  मैं , पल पल  मरता  हूँ !

झींगुर से  पूछो, प्यास  कैसे   बुझाते  हैं , 
नदी में  डूबकर ;समंदर में  निकलता हूँ  !

कोहसार  में  बनाया  मैंने अपना बसेरा,
कोहराम  नहीँ ,गिरकर  भी  सँभलता हूँ !
                          ***
-'कान्त '
*वक़ूफ़ -સમજ *हड़कंप-ખળભળાટ 
*झींगुर -તમરું *कोहसार-પહાડ 
*कोहराम -રોકકડ 


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