बसंत
हरखि हरखि आई बसंत,
गुन-गुन राग छेड़ा रे
अन्तर स्वर फिर से हेरा रे !
प्रेम सरगम झनक झनकी,
गीत हिलमिल गाये रे
प्राण प्रभंजन जागे प्यारे,
सातों सुर लहराए रे !
रंग सारे निखरे पकृति के,
कामदेव ने डाला डेरा रे !
अन्तर स्वर फिर से हेरा रे !
बरसेगी अब शबनम सयानी,
कुहू-कुहू कोयल की बानी
डाली-डाली रति नाचेगी,
बुढ़ापे को आ जाए जवानी !
फूलों से झूमे ये बंजर धरती,
अप्सराओंका बसेरा रे !
अन्तर स्वर फिर से हेरा रे !
***
-'कान्त'
हरखि हरखि आई बसंत,
गुन-गुन राग छेड़ा रे
अन्तर स्वर फिर से हेरा रे !
प्रेम सरगम झनक झनकी,
गीत हिलमिल गाये रे
प्राण प्रभंजन जागे प्यारे,
सातों सुर लहराए रे !
रंग सारे निखरे पकृति के,
कामदेव ने डाला डेरा रे !
अन्तर स्वर फिर से हेरा रे !
बरसेगी अब शबनम सयानी,
कुहू-कुहू कोयल की बानी
डाली-डाली रति नाचेगी,
बुढ़ापे को आ जाए जवानी !
फूलों से झूमे ये बंजर धरती,
अप्सराओंका बसेरा रे !
अन्तर स्वर फिर से हेरा रे !
***
-'कान्त'
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