Monday, 6 February 2017

ग़ज़ल 

दर्द  भरा;  ये   ज़माना  है,
खाली ;  मेरा   पैमाना  है.

दारु पीने का  शोख  नहीं,
बस ;गमों को भगाना  है.

बंदिशें ;ग़ज़ल की घायल,
काफ़िये  को   बचाना  है. 

शायर  की  किस्मत पाई,
न  घर  है; न  ठिकाना है. 

तड़पती है बुलबुल प्यारी,
पिंज़रा ;ही  क़ैदख़ाना  है.

क्या पाया ? इस जहां से,
जीस्त ने  फैंका  दाना है. 

अश्क़ ने, धो  डाले  चर्चे, 
किस्सा  बड़ा  पुराना  है.
               ***
-'कान्त' 


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