शादी की साल-गिरह
चार सदियों का ये रिश्ता ,
हमारे लिए अनमोल है.
आज़तक चले आ रहे ,
तोल -मोल के बोल हैं.
हम देख रहे हैं बीती हुईं घड़ियाँ ,
आने वाले वक़्त की फुलझड़ियाँ.
मखमल पर भी सोये,मज़ा काँटों का भी लिया,
अमावस की काली रात हो ,
या पूर्णिमा ,हमने साथ-साथ जिया !
ये जीना,हँसना ,मचलना,
दुनिया की तरह गोल है।
आजतक चले आ रहे,
तोल -मोल के बोल हैं।
विपदाएँ आईं ,पलकों से आँसू भी छलके ,
इन ४२ सालों में,कभी न जिए हम ढल के !
गुज़रे हुए वक्त की बातें क्या सुनायें !
कुछ मीठे-मीठे पल हम आज भी गुनगुनाएँ !
कभी रूठे,एक दूसरे को मनाया ,
सप्तपदी की कसमों को दोहराया।
बस कुछ ऐसे ही पल ,बज रहा ढोल है,
आज तक चले आ रहे ,
तोल मोल के बोल हैं।
हम अपने दांपत्य में ,चेतना नई भरें
आप सब की शुभकामनाओं से,
शादी की सालगिरह को नवपल्ल्वित करें।
जीना है अब एक नई साझेदारी में
कभी न बिछड़ें एक-दूजे से,
जीवन की इस फुलवारी में।
धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष को जी लिया ,
जो कुछ था एक-दूसरे को दे दिया।
चंचल-चितवन मिलने को लोल है ,
आज तक चले आ रहे ,
तोल मोल के बोल हैं।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
चार सदियों का ये रिश्ता ,
हमारे लिए अनमोल है.
आज़तक चले आ रहे ,
तोल -मोल के बोल हैं.
हम देख रहे हैं बीती हुईं घड़ियाँ ,
आने वाले वक़्त की फुलझड़ियाँ.
मखमल पर भी सोये,मज़ा काँटों का भी लिया,
अमावस की काली रात हो ,
या पूर्णिमा ,हमने साथ-साथ जिया !
ये जीना,हँसना ,मचलना,
दुनिया की तरह गोल है।
आजतक चले आ रहे,
तोल -मोल के बोल हैं।
विपदाएँ आईं ,पलकों से आँसू भी छलके ,
इन ४२ सालों में,कभी न जिए हम ढल के !
गुज़रे हुए वक्त की बातें क्या सुनायें !
कुछ मीठे-मीठे पल हम आज भी गुनगुनाएँ !
कभी रूठे,एक दूसरे को मनाया ,
सप्तपदी की कसमों को दोहराया।
बस कुछ ऐसे ही पल ,बज रहा ढोल है,
आज तक चले आ रहे ,
तोल मोल के बोल हैं।
हम अपने दांपत्य में ,चेतना नई भरें
आप सब की शुभकामनाओं से,
शादी की सालगिरह को नवपल्ल्वित करें।
जीना है अब एक नई साझेदारी में
कभी न बिछड़ें एक-दूजे से,
जीवन की इस फुलवारी में।
धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष को जी लिया ,
जो कुछ था एक-दूसरे को दे दिया।
चंचल-चितवन मिलने को लोल है ,
आज तक चले आ रहे ,
तोल मोल के बोल हैं।
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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