ग़ज़ल
बड़ा दुश्वार है, किसीको गले लगाना,
मुश्किल होता है, अपने आपको मनाना.
दिल की हर बात,हकीकत हो नहीं शकती ,
सपनों का लगा रहता है आना जाना.
बोतलें खोलकर तो सभी पी लेते हैं ,
सहल नहीं,जहां को आँखों से पिलाना.
एक छोटा सा लम्हा भी,सुकून देता है,
इश्क के तार से जब बजता है तराना .
दिलावर लोग भी ,तूट जाते हैं जिस्त में,
अंजुमन में हँसता है जब उनपे जमाना.
शबनम से तर है, आज बागबान भी,
गुलशन से सीख लिया है मुस्कराना.
***
-'कान्त'
बड़ा दुश्वार है, किसीको गले लगाना,
मुश्किल होता है, अपने आपको मनाना.
दिल की हर बात,हकीकत हो नहीं शकती ,
सपनों का लगा रहता है आना जाना.
बोतलें खोलकर तो सभी पी लेते हैं ,
सहल नहीं,जहां को आँखों से पिलाना.
एक छोटा सा लम्हा भी,सुकून देता है,
इश्क के तार से जब बजता है तराना .
दिलावर लोग भी ,तूट जाते हैं जिस्त में,
अंजुमन में हँसता है जब उनपे जमाना.
शबनम से तर है, आज बागबान भी,
गुलशन से सीख लिया है मुस्कराना.
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-'कान्त'
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