ग़ज़ल
हमने इक शाम,चरागों से सजा रखी है,
शर्त लोगों ने ,हवाओं से लगा रखी है.
हमें तो बस अकेले ही चलना आया,
रवानी अपनी, दिशाओं से बचा रखी है.
इस ढलवान पर,पानी कभी नहीं ठहरा,
बदली को , आँसुओं से छिपा रखी है.
बिकते जो पत्थर ,तो कोई गम न था,
नीलामी फूलों की,काँटों से करा रखी है.
ये ग़ज़ल ,हम से बहुत कुछ कह गई,
दास्ताँ अपनी फ़िदाओं से लिखा रखी है.
***
-'कान्त'
.
हमने इक शाम,चरागों से सजा रखी है,
शर्त लोगों ने ,हवाओं से लगा रखी है.
हमें तो बस अकेले ही चलना आया,
रवानी अपनी, दिशाओं से बचा रखी है.
इस ढलवान पर,पानी कभी नहीं ठहरा,
बदली को , आँसुओं से छिपा रखी है.
बिकते जो पत्थर ,तो कोई गम न था,
नीलामी फूलों की,काँटों से करा रखी है.
ये ग़ज़ल ,हम से बहुत कुछ कह गई,
दास्ताँ अपनी फ़िदाओं से लिखा रखी है.
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-'कान्त'
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