Sunday, 26 February 2017

ग़ज़ल 

मैं  ग़ज़ल   मतवाली   लिखता  हूँ ,
रोटी-दाल   की  थाली  लिखता हूँ.

चाँद-सितारे   मुझसे  रूठ  गए  हैं ,
अब तो  रातें    काली  लिखता  हूँ.

ईमानदारी  का सबूत देने के लिए,
कपोलकल्पना ख्याली लिखता हूँ.

इलाही  अब  कुछ  माँग   न  बैठे,  
अपने आप को,सवाली लिखता हूँ.

तलखिए -अईयाम  सताने  लगे,
मयकदे  की   प्याली  लिखता हूँ.

छत  पर शबनम उदास  बैठी  है,
बूंदों पे  उसकी, लाली लिखता हूँ.

चेहरे पर  जब हँसी  छा जाती है,
हाथों  पर  मैं  ताली  लिखता  हूँ.
                  ***
-'कान्त'

No comments:

Post a Comment