Saturday, 4 February 2017

ग़ज़ल 
(फिलबदिह )

बरदाश्त   आदमी  की   तबीयत  में  चाहिए,
सुकून  हमनवाओं  की  सोहबत  में  चाहिए। 

कमबख़्त  ढूँढता  रहा  खुद को  मयखाने में,
लड़खड़ाना उसे किसी की इशारत पे  चाहिए। 

सब  कुछ   सही  ही  हो  रहा  है  अंजूमन  में,
दिलेपूर   आरजू   हमें ,  उलफ़त  में  चाहिए।  

फ़नकार करते  हैं  बे-तहाशा  प्यार,  फन से ,
बिस्मिल  बुत  पे  होना, किस्मत में चाहिए। 

महजूज  होता  है  खुदा  अपने  नमाजी  पर,
दिल का इज़हार,बंदे  की इबादत में  चाहिए।  

दहेरी फानी से  इक दिन  उठ जाना है यारो,
या रब तेरी रहेमियत, कयामत  में  चाहिए। 

'कान्त 'की  ग़ज़ल,बंदिशे अल्फ़ाज़ सदा की,
दिले -खराश  शेर  की  ख़िदमत  में  चाहिए। 
                           ***
-'कान्त' '





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