Sunday, 19 October 2014

               शरण !

मैं तो  कब से तेरे दर पर हुँ ,
तू  मुझे एक नया मुकाम दे !

हृदय के सारे तू  बाँध खोल ,
तेरी  दया  का  मुझे दान  दे !

तूने  मुझ से गीत गवाये हैं ,
खिला खिला  सुख का खेल !

रुला दिया  क्यों  तूने  अब,
मुझे  आँसुओं की  धार   दे !

तू हाथ लगे पर हाथ न आये ,
पास  पहोंचूं  तू  छिटक जाये !

मौन कर दे तू मुझको  अब,
तेरे  चरण में  मुझे स्थान दे !

अब चल पडूँ मैं सब छोड़कर,
जीवन मेरा  युँ  अब मोड़कर !

तेरे दरश की ही अब  चाह  है,
दर्शन  मुझे  अब भगवान  दे !
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-'कान्त'
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