शरण !
मैं तो कब से तेरे दर पर हुँ ,
तू मुझे एक नया मुकाम दे !
हृदय के सारे तू बाँध खोल ,
तेरी दया का मुझे दान दे !
तूने मुझ से गीत गवाये हैं ,
खिला खिला सुख का खेल !
रुला दिया क्यों तूने अब,
मुझे आँसुओं की धार दे !
तू हाथ लगे पर हाथ न आये ,
पास पहोंचूं तू छिटक जाये !
मौन कर दे तू मुझको अब,
तेरे चरण में मुझे स्थान दे !
अब चल पडूँ मैं सब छोड़कर,
जीवन मेरा युँ अब मोड़कर !
तेरे दरश की ही अब चाह है,
दर्शन मुझे अब भगवान दे !
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-'कान्त'
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मैं तो कब से तेरे दर पर हुँ ,
तू मुझे एक नया मुकाम दे !
हृदय के सारे तू बाँध खोल ,
तेरी दया का मुझे दान दे !
तूने मुझ से गीत गवाये हैं ,
खिला खिला सुख का खेल !
रुला दिया क्यों तूने अब,
मुझे आँसुओं की धार दे !
तू हाथ लगे पर हाथ न आये ,
पास पहोंचूं तू छिटक जाये !
मौन कर दे तू मुझको अब,
तेरे चरण में मुझे स्थान दे !
अब चल पडूँ मैं सब छोड़कर,
जीवन मेरा युँ अब मोड़कर !
तेरे दरश की ही अब चाह है,
दर्शन मुझे अब भगवान दे !
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-'कान्त'
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