Thursday, 30 October 2014

           मूरत 

प्रभु अति सुंदर मूरत  तेरी,
अब आँखें तृप्त हुईं हैं मेरी !

नयन कमल से होठ रसीले ,
बंसी से निकलें  सुर सुरीले !

हास्य मधुर-गमन मनोहर,
हृदय तेरा - प्रशांत  सरोवर !

प्रभु अनुपम है रूप तुम्हारा,
अब साँसें लुप्त हुईं हैं  मेरी !

गालपे खंजन तू दुःखभंजन,
नयनोंमे आँजे है   तू अंजन !

पतली कमरिया रास रचैया ,
पाँव में बाजे मधुर पैंजनिया !

तन पर सोहे पीला पीतांबर,
मोर पिच्छ का रंग नीलांबर !

प्रभु काले घने गेसु तुम्हारे,
अब आँखें तृप्त हुई हैं  मेरी !
               ***
-'कान्त '

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