Monday, 20 October 2014

           दिवाली है  !

अंधकार को दूर  भगायें 
---------आज दिवाली है !

घर आँगन में दीप जलायें,
---------आज दिवाली है ! 

कैसे रात छिपी है ये काली,
विनय ज्योत  को   धरकर। 

तमस की घेरी  छायाओंको ,
अपने  भीतर -तल  भरकर। 

बाधाएं हैं चलो उन्हें छुड़ायें,
-----------आज दिवाली  है !

भरा हुआ है अभी हृदय मेरा,
तुम जो चाहो   हो जाऊँ तेरा !

बाहर   मेरा संताप हरो तुम,
इसी तरह मन में करो बसेरा !

शत  शत्रुओँको  चलो   हरायें ,
------------आज दिवाली  है !

आज खोलो हृदय दल  खोलो,
ये मेरा,ये तेरा है दिल से भूलो !

निज सौरभ को लहराकर तुम,
रस से भरे भरे मीठे बोल बोलो !

सहस छेदकर  बांसुरी  बजाएँ ,
-------------आज दिवाली  है !
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-'कान्त'
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