Tuesday, 18 July 2017

गीत 

वर्षा  की    बूँदों   में   जीवन    बरसे,
मेरे मन में यादों  का  सावन  सरसे। 

फ़ूट  गया  उनका  इक़बाल   बेचारा,
जिन्होंने  इन बादलों को  न पुकारा। 

उनका  जीना  भी  क्या  जीना  यारो,
जिनके   प्राणों   में  गीत  न  छलके। 

देख   रहा   हूँ  गलियों   में  मैं  पानी,
गोरी के  संग  कर रहा  है  मनमानी। 

तन-मन-धन , सब   अर्पण  है  मेरा,
साथ  न  तुम  तो ,मैं  बहूँगा  गलके। 

झरोखे   इन  बादल  के मैं  पा  लूँगा,
आसमान को  दो कदमों  में नापूँगा। 

स्वरों  का  न  संगम, बाँसुरी  अधूरी,
भीग गईं   हैं  मेरी  आँखों  की पलकें। 
                      ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '



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