Friday, 14 July 2017

ग़ज़ल 

तू  गुनगुनाये  तो  ग़ज़ल  पे  निख़ार  आ जाता  है,
बदली  बरसती  है, खिज़ा  पे  ज़माल  आ जाता  है। 

दिल  धड़कता  है  हर  पल,  साँसें   तेज  चलती  हैं ,
चाँदनी के  नाजुक  जिस्म  में, उबाल  आ जाता है। 

अज़नबी  की  तरह  मिल जाए  तू किसी  मोड़  पर,
बिखरे   रिश्तों   के ,लम्हों  का  ख्याल आ जाता है। 

जवानी  के जोश  में  नादानियाँ  कौन  नहीं करता ?
जुबाँ  पे  मेरी   यही  दर्द   भरा  सवाल  आ जाता है। 

हम  थे  जो  तूफानों  का  रुख  मोड़  दिया करते थे,
आज  तो  किनारों  पर  भी    भूचाल  आ   जाता है। 
                                ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '

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