Thursday, 8 May 2014

आवाज़ 

गोधूलि  समय पर आप स्नान करके,
गृहस्थी की उलझन और  शोरापुश्त 
दरीखाने  से दूर भागवतका ,
स्व कंठ से पाठ करने बैठ जाते हैं !
मुझे आपकी आवाज़ सुनाई देती है ..
'सुनती हो ?कहाँ चली गई?,
यहाँ आ कर बैठ,और सुन.... !'
पर ....मैं तो चूल्हे के पास खड़ी चुपचाप 
आपके लिये खाना बना रही हुँ....
सेंकड़ो बिन मांजे बरतन ,
मेरी  प्रतिक्षा में हैं। 
और सेंकड़ो छोटे -मोटे काम ,
जो मुझे कल करने पड़ेंगे …
मेरे  मिट्टी से पुते हाथोँ से मैँ  भी ,
पलट रही हूँ एक विराट भागवत के पन्ने ,
आखिरी      साँस तक खत्म न होनेवाला ,
ये भागवत है   !!!
जिसे मैं मेरी मरज़ी  से पढ़ती जा रही हुँ ,
और जिसे आप कभी आकर नहीं    सुनते !!!
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-विजयलक्ष्मी (मलयालम कवियत्री )
-किशोर शाह (गुजराती अनुवाद )
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '(हिंदी अनुवाद)
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