Saturday, 3 May 2014

              ग़ज़ल 

चाँद तन्हा है सितारे भी तन्हा ,
ढ़लती हुई शाम, मैं   भी तन्हा !

पिछली यादों में हम जी रहे  हैं ,
बिछड़े लम्हों को हम पी रहे  हैं !

बीते हुए कल के पल भी  तन्हा,
बंध   खिड़की के शीशे भी तन्हा

इश्क है तो दर्द की मत बात करो,  
इश्क में दर्दों का मौसम रहता है 

आँख से टपके अश्क वो भी तन्हा,
भीगा भीगा सा दामन भी तन्हा !  

बढ़ती बेचैनी की नज़ाकत   देखो, 
मजनू   को देखो   लैला को देखो !

शायर हुँ ,मेरी ग़ज़ल भी है तन्हा,
'फलक' की आवाज़ भी है   तन्हा !
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-कृष्णकांत भाटिया 'फलक'
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