Wednesday, 20 January 2016

ग़ज़ल 

याद  में  जब दिन ढ़लता  है,
दर्द  हृदय में  मेरे   पलता है. 

बिछड़े  हुए काश  मिलते हों,
बस यही खाव्ब  मचलता है. 

इस  शहर में तुम जूझ  गए,
एक-एक पल यही कहता है.  

पास  बैठकर  कविता बाँटी ,
वो   प्रवाह भीतर  बहता  है. 

सुरशब्द  हो  या  हो  सुरभि,
सांध्य दीप  भी  अखरता है. 

विधाता  लौटा  दो वो लम्हे, 
जिस में अनुज भी रहता है.   
                ***
-'कान्त '



No comments:

Post a Comment