ग़ज़ल
याद में जब दिन ढ़लता है,
दर्द हृदय में मेरे पलता है.
बिछड़े हुए काश मिलते हों,
बस यही खाव्ब मचलता है.
इस शहर में तुम जूझ गए,
एक-एक पल यही कहता है.
पास बैठकर कविता बाँटी ,
वो प्रवाह भीतर बहता है.
सुरशब्द हो या हो सुरभि,
सांध्य दीप भी अखरता है.
विधाता लौटा दो वो लम्हे,
जिस में अनुज भी रहता है.
***
-'कान्त '
याद में जब दिन ढ़लता है,
दर्द हृदय में मेरे पलता है.
बिछड़े हुए काश मिलते हों,
बस यही खाव्ब मचलता है.
इस शहर में तुम जूझ गए,
एक-एक पल यही कहता है.
पास बैठकर कविता बाँटी ,
वो प्रवाह भीतर बहता है.
सुरशब्द हो या हो सुरभि,
सांध्य दीप भी अखरता है.
विधाता लौटा दो वो लम्हे,
जिस में अनुज भी रहता है.
***
-'कान्त '
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