ग़ज़ल
कोई सो कर सबकुछ खोता है,
कोई जागकर सबकुछ पाता है !
अपनी किस्मत अपने हाथोंमे ,
ज़िंदगी है तो तूफ़ान आता है. !
गर्दिश में रहते हैं सितारे भी,
चाँद उनको भी खा जाता है !
सरे बाज़ार किसी से मत रूठो,
इश्क़ -क्रंदन ही साथ लाता है !
सारे जहाँ में जिसकी मौजूदगी,
वो ही तो सब का दाता है !
दरिया-ए -हुश्न पर पर्दा क्यूँ ?
रब हाथों से जिसे तराशता है !
***
-'कान्त '
कोई सो कर सबकुछ खोता है,
कोई जागकर सबकुछ पाता है !
अपनी किस्मत अपने हाथोंमे ,
ज़िंदगी है तो तूफ़ान आता है. !
गर्दिश में रहते हैं सितारे भी,
चाँद उनको भी खा जाता है !
सरे बाज़ार किसी से मत रूठो,
इश्क़ -क्रंदन ही साथ लाता है !
सारे जहाँ में जिसकी मौजूदगी,
वो ही तो सब का दाता है !
दरिया-ए -हुश्न पर पर्दा क्यूँ ?
रब हाथों से जिसे तराशता है !
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-'कान्त '
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