ग़ज़ल
हमारी चौखट पे लोग, गिरने आते हैं ,
कुछ लम्हे ज़िंदगी के जीने आते हैं।
ऐशआराम मिलता है, कोठे की पनाह में ,
मुन्नीबाई की झलक देखने आते हैं।
महफ़िल में तबले की धक -धिना -धिन ,
घुंघरू की आवाज़ में मचलने आते हैं।
हमारी चौखट पे लोग, गिरने आते हैं ,
कुछ लम्हे ज़िंदगी के जीने आते हैं।
ऐशआराम मिलता है, कोठे की पनाह में ,
मुन्नीबाई की झलक देखने आते हैं।
महफ़िल में तबले की धक -धिना -धिन ,
घुंघरू की आवाज़ में मचलने आते हैं।
No comments:
Post a Comment