Tuesday, 23 August 2016

ग़ज़ल 

चारों    ओर   निराशा   है,
बची   न   कोई  आशा  है। 

कब  अच्छे  दिन  आएँगे ?
उसकी  क्या परिभाषा  है ?

दिल से   दिल जुड़  जायें,
एक यही,   अभिलाषा  है। 

रोटी-पानी,जलता चूल्हा,
पापी  पेट  की   भाषा  है।  

काटछाँट  नहीँ है  हमारी,
कहना  कुछ  जरा सा  है। 
               ***
-'कान्त'







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