ग़ज़ल
चारों ओर निराशा है,
बची न कोई आशा है।
कब अच्छे दिन आएँगे ?
उसकी क्या परिभाषा है ?
दिल से दिल जुड़ जायें,
एक यही, अभिलाषा है।
रोटी-पानी,जलता चूल्हा,
पापी पेट की भाषा है।
काटछाँट नहीँ है हमारी,
कहना कुछ जरा सा है।
***
-'कान्त'
चारों ओर निराशा है,
बची न कोई आशा है।
कब अच्छे दिन आएँगे ?
उसकी क्या परिभाषा है ?
दिल से दिल जुड़ जायें,
एक यही, अभिलाषा है।
रोटी-पानी,जलता चूल्हा,
पापी पेट की भाषा है।
काटछाँट नहीँ है हमारी,
कहना कुछ जरा सा है।
***
-'कान्त'
No comments:
Post a Comment