Tuesday, 30 August 2016

ग़ज़ल 

ग़ज़ल  तो  महफ़िल  में   सुनाई  जाती  है,
अपनों को  दिल की  बात  बताई जाती  है। 

तिकड़म  नहीं  चलता , दिल  के  सौदे  में,
हक़ीक़त , आमने सामने सजाई  जाती है। 

नवाज़िश  है  रब  की, मुहब्बत  में  डूबना,
इश्क  पे  पाबंदियाँ  क्यों  लगाई जाती  हैं ?

जाने-अनजाने  सब कुछ  करना पड़ता  है,
गधे  के  सामने  भी  बीन   बजाई जाती है। 

फ़िक्रमंद है शायर,नजम के छंद  टूटने से,
अब तो रचना में, अक्ल  मिलाई जाती है। 
                           ***
-'कान्त '









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