ग़ज़ल
ग़ज़ल तो महफ़िल में सुनाई जाती है,
अपनों को दिल की बात बताई जाती है।
तिकड़म नहीं चलता , दिल के सौदे में,
हक़ीक़त , आमने सामने सजाई जाती है।
नवाज़िश है रब की, मुहब्बत में डूबना,
इश्क पे पाबंदियाँ क्यों लगाई जाती हैं ?
जाने-अनजाने सब कुछ करना पड़ता है,
गधे के सामने भी बीन बजाई जाती है।
फ़िक्रमंद है शायर,नजम के छंद टूटने से,
अब तो रचना में, अक्ल मिलाई जाती है।
***
-'कान्त '
ग़ज़ल तो महफ़िल में सुनाई जाती है,
अपनों को दिल की बात बताई जाती है।
तिकड़म नहीं चलता , दिल के सौदे में,
हक़ीक़त , आमने सामने सजाई जाती है।
नवाज़िश है रब की, मुहब्बत में डूबना,
इश्क पे पाबंदियाँ क्यों लगाई जाती हैं ?
जाने-अनजाने सब कुछ करना पड़ता है,
गधे के सामने भी बीन बजाई जाती है।
फ़िक्रमंद है शायर,नजम के छंद टूटने से,
अब तो रचना में, अक्ल मिलाई जाती है।
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-'कान्त '
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