Wednesday, 12 August 2015

ग़ज़ल 

इस    क़दर    क्यों   सताते    हो ?
क़िल्ल्त   ही    क्यों   बताते   हो ?

क़िस्तबन्दी क़ुबूल कर ली हमने,
खुदा - कसम  क्यों  दिलाते   हो ?

पतझड़  से  ही  इश्क है  हम को,
फ़स्ले - गुल को क्यों  बुलाते हो  ?

फ़ाहिश नहीं  है हमारी ये क़लम ,
फ़िर-इतना शोर क्यों मचाते हो  ?

खिलखिलाना  तुम्ही से  सीखा ,
फिटकार  कर  क्यों रुलाते  हो ?

माना ,रंजिशें हैं  हमारे दरमियाँ ,
लड़ने   लश्कर  क्यों  बुलाते  हो  ?

लहालोट  हैं हम तुम से मिलकर,
ख़ामोशी  पर क्यों चिल्लाते  हो ? 
                   ***
'कान्त '
  

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