ग़ज़ल
मेरी बहार को मौसम का इन्तज़ार नहीं ,
कोई जो हँस के मिला ,मिल गई बहार मुझे !
मैं लेके नहीं फिरता सपनों का दर्पण,
तेरी सूरत में मिल जाता है इकरार मुझे !
मैं अपने ही घर के आँगन को सजाता हुँ ,
तेरी आहट कर जाती है बे-करार मुझे !
वो तुम्हीं तो थी बारिश की भीगती रातों में ,
आज फिर ये बादल कहते हैं सरकार मुझे !
चाँद को देखते ही चेहरा तेरा याद आता है ,
ये हवा ये चमन से न कोई सरोकार मुझे !
खिलते गुलशन की मुझको ज़रूरत नहीं ,
कुछ दिलखराश बातों से तकरार है मुझे !
दिल को छू लेने वाली बात है इस ग़ज़ल में,
आ, आग़ोश में समा जा ,ये इसरार है मुझे !
***
-'कान्त'
No comments:
Post a Comment