Tuesday, 11 August 2015

ग़ज़ल 

मेरी  बहार  को  मौसम  का  इन्तज़ार नहीं ,
कोई जो हँस के मिला ,मिल गई बहार मुझे !

मैं   लेके   नहीं   फिरता  सपनों  का  दर्पण,
तेरी   सूरत में  मिल जाता है  इकरार मुझे !

मैं   अपने ही  घर के आँगन को सजाता  हुँ ,
तेरी   आहट  कर  जाती  है  बे-करार   मुझे !

वो तुम्हीं तो थी बारिश की भीगती रातों में ,
आज फिर ये बादल कहते हैं  सरकार  मुझे !

चाँद को देखते ही  चेहरा तेरा याद आता है ,
ये हवा ये  चमन से न  कोई सरोकार  मुझे !

खिलते  गुलशन की मुझको  ज़रूरत  नहीं ,
कुछ  दिलखराश  बातों से   तकरार है मुझे !

दिल को छू लेने वाली बात है इस ग़ज़ल में,
आ, आग़ोश में समा जा ,ये  इसरार है मुझे !
                             ***
-'कान्त'






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