ग़ज़ल
मेरी बाँहों में समाकर कभी इसरार मत करना,
इश्क़ में जो होता है उससे इन्कार मत करना !
ज़िन्दगी में मुहब्बत की उजलत भी जरूरी है,
दिल का सौदा तुम कभी इख़राज मत करना !
चाहत है सनम ये हमारी सेंकडों जन्मों की ,
तू किसी और से कभी इत्तहाद मत करना !
तू मुझ से नाराज हो जाये ,मैं भी ख़फ़ा हो जाऊँ ,
वक़्त आये कभी ऐसा, इर्तकाब मत करना !
दो दिलों को अक्सर तड़पा जाते हैं अफ़साने,
पायलों सी झलक जाना, इलहाम मत करना !
तेरी चाहत का मजनूँ ये दीवाना है सदियों से,
लौट जाने का यकायक हमें , इरशाद मत करना !
यही जज़बा रहा तो ज़रूर ,कोई हल निकलेगा,
इन हसीन लम्हों को तुम, शर्मसार मत करना !
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-'कान्त'
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