रफ़ी
सुरों के शबाब थे रफ़ी,
मूसीक़ी के नवाब थे रफ़ी !
उभरे, सारे जहाँ पर छा गये ,
सरगम के आफ़ताब थे रफ़ी !
आँसु ,उनके दिलकी जुबान,
दर्द का जवाब थे रफ़ी !
मन तड़पता हरि के लिए,
दर्शन में ला-जवाब थे रफ़ी !
न जमीं के थे न आसमाँ के,
कायनात की आदाब थे रफ़ी !
गीतों के द्वार के थे जोगी,
खुदा के आबताब थे रफ़ी !
***
-'कान्त'
सुरों के शबाब थे रफ़ी,
मूसीक़ी के नवाब थे रफ़ी !
उभरे, सारे जहाँ पर छा गये ,
सरगम के आफ़ताब थे रफ़ी !
आँसु ,उनके दिलकी जुबान,
दर्द का जवाब थे रफ़ी !
मन तड़पता हरि के लिए,
दर्शन में ला-जवाब थे रफ़ी !
न जमीं के थे न आसमाँ के,
कायनात की आदाब थे रफ़ी !
गीतों के द्वार के थे जोगी,
खुदा के आबताब थे रफ़ी !
***
-'कान्त'
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