ग़ज़ल
रुखसत के वक्त रूठ गया हम से एक दोस्त,
जाते -जाते ही छूट गया हम से एक दोस्त।
सब ज़िंदगी को देते हैं , जिंदादिली का नाम,
फिर क्यूँ आशियाना लूंट गया हम से एक दोस्त ?
दोस्ती पे आँच आ जाए तो सर कलम कर देना,
शीशे की तरह ही क्यों टूट गया हमसे एक दोस्त ?
बिखर गईं एक -एक करके रिश्तों की जंजीरें ,
बीच रास्ते मेँ ही फूट गया हम से एक दोस्त।
छोड़ देता कोई और हमें , तो ख़ास ग़म न था,
ये तो कर के गया कूट हम से एक दोस्त।
***
-'कान्त'
रुखसत के वक्त रूठ गया हम से एक दोस्त,
जाते -जाते ही छूट गया हम से एक दोस्त।
सब ज़िंदगी को देते हैं , जिंदादिली का नाम,
फिर क्यूँ आशियाना लूंट गया हम से एक दोस्त ?
दोस्ती पे आँच आ जाए तो सर कलम कर देना,
शीशे की तरह ही क्यों टूट गया हमसे एक दोस्त ?
बिखर गईं एक -एक करके रिश्तों की जंजीरें ,
बीच रास्ते मेँ ही फूट गया हम से एक दोस्त।
छोड़ देता कोई और हमें , तो ख़ास ग़म न था,
ये तो कर के गया कूट हम से एक दोस्त।
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-'कान्त'
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