ग़ज़ल
आँखों से भी बात बताई जाती है ,
सपनों में भी डोली सजाई जाती है।
दुल्हन से पूछो -पूछो उसके दिल से,
पलकों पे उसे कैसे बिठाई जाती है।
जिसे ढूंढ़ने पश्चिम पंख फड़फड़ाये,
हमें गोद में ये बात सिखाई जाती है।
झींगुर की आवाज़ कहती है हरदम,
तन्हाइयों में भी रात बिताई जाती है।
जीने के लिए सब कुछ करना पड़ता है,
बहरों के आगे कविता सुनाई जाती है।
ग़ज़ल लिखूंगा और 'कान्त' देखूंगा,
शब्दासन पर ये कैसे बिठाई जाती है।
***
-'कान्त'
आँखों से भी बात बताई जाती है ,
सपनों में भी डोली सजाई जाती है।
दुल्हन से पूछो -पूछो उसके दिल से,
पलकों पे उसे कैसे बिठाई जाती है।
जिसे ढूंढ़ने पश्चिम पंख फड़फड़ाये,
हमें गोद में ये बात सिखाई जाती है।
झींगुर की आवाज़ कहती है हरदम,
तन्हाइयों में भी रात बिताई जाती है।
जीने के लिए सब कुछ करना पड़ता है,
बहरों के आगे कविता सुनाई जाती है।
ग़ज़ल लिखूंगा और 'कान्त' देखूंगा,
शब्दासन पर ये कैसे बिठाई जाती है।
***
-'कान्त'
No comments:
Post a Comment