Saturday, 26 March 2016

ग़ज़ल 

आँखों  से   भी   बात  बताई  जाती  है ,
सपनों में  भी  डोली  सजाई  जाती  है। 

दुल्हन से  पूछो -पूछो उसके  दिल से,
पलकों  पे  उसे  कैसे  बिठाई जाती है। 

जिसे  ढूंढ़ने  पश्चिम  पंख फड़फड़ाये, 
हमें  गोद में  ये बात सिखाई जाती है। 

झींगुर  की  आवाज़ कहती है  हरदम, 
तन्हाइयों में भी रात  बिताई जाती है। 

जीने के लिए सब कुछ करना पड़ता है,
बहरों के आगे  कविता सुनाई जाती है। 

ग़ज़ल  लिखूंगा और  'कान्त' देखूंगा,
शब्दासन पर ये कैसे बिठाई जाती है। 
                      ***
-'कान्त'


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