ग़ज़ल
दर्द को घर का निगाहबान किया है मैंने,
बहार हूँ ; पतझड़ को मेहमान किया है मैंने।
तुम किसको ढूंढते फिरते हो आशियाने में ?
बुलबुल को उड़ने का फरमान किया है मैंने।
रुखसत के वक्त ही तुम रूठ गये मुझ से,
तुम्हारी हर अदा का सम्मान किया है मैंने।
लोग तो खूबसूरती पर जान छिड़कते हैं ,
ज़िस्म नहीं;दिल का अरमान किया है मैंने।
बुूुझे हुए शोलों को सभी हवा दिया करते हैं ,
आग लगाने वालों पे अभियान किया है मैंने।
अब तक तो मचलतीं थीं मेरी ये ग़ज़लें ,
ल गा गा पिलाकर उन्हें बेजान किया है मैंने।
***
-'कान्त'
दर्द को घर का निगाहबान किया है मैंने,
बहार हूँ ; पतझड़ को मेहमान किया है मैंने।
तुम किसको ढूंढते फिरते हो आशियाने में ?
बुलबुल को उड़ने का फरमान किया है मैंने।
रुखसत के वक्त ही तुम रूठ गये मुझ से,
तुम्हारी हर अदा का सम्मान किया है मैंने।
लोग तो खूबसूरती पर जान छिड़कते हैं ,
ज़िस्म नहीं;दिल का अरमान किया है मैंने।
बुूुझे हुए शोलों को सभी हवा दिया करते हैं ,
आग लगाने वालों पे अभियान किया है मैंने।
अब तक तो मचलतीं थीं मेरी ये ग़ज़लें ,
ल गा गा पिलाकर उन्हें बेजान किया है मैंने।
***
-'कान्त'
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