Saturday, 7 May 2016

माँ !

प्रेम  का  स्वीकार  है  तू  माँ !
ममता का अवतार  है तू  माँ !

तेरी   गोद  में   ऋचाऍ   खेलें,
निराकार में  आकार है तू माँ !

संबंध  हैं   समर्पित   तुझ  में,
बच्चों  का   दुलार   है  तू  माँ !

लड़कपन  को  हरा-भरा रख्खे,
 करुणा  का   भंडार  है  तू माँ !

रंग-नूर और ख़ुश्बू से भरी हुई,
गुलशन  की   बहार  है  तू माँ !

क़ायनात की  सीमा  से  आगे,
खुद; असीम विस्तार है तू माँ !

नाम तेरा;   जब  लब पे  आये,
'कान्त'की  नवकार   है तू माँ !
                 ***
-'कान्त '




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