Monday, 2 May 2016

ग़ज़ल   

कभी  कभी जहाँ  में  ऐसा  भी  होता  है,
लयला  मिलने  पर  भी  मजनू रोता है। 

फूलों जैसी खुश्बू  आ जाती है काँटों में ,
आम मिल जाते उसे जो बबूल बोता है। 

बातों ही बातों में  बन जाते हैं अफ़साने,
सब कुछ पाकर -वो सब कुछ खोता  है। 

कोहराम मच जाता है  जब  आँगन में,
इन्सां  दुखः को अपने कंधों पे ढोता है। 

मुआफ़िक  हैं  ये   बहतीं   शर्द   हवाएँ , 
सूरज  भी  आसमान ओढ़  के सोता है। 

कोहनूर  पकेंगे  अब  हमारे   खेतों  में,
बहुत दिनों  बाद ,मैंने   हल  जोता  है. 
                       ***
-'कान्त'


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