ग़ज़ल
कभी कभी जहाँ में ऐसा भी होता है,
लयला मिलने पर भी मजनू रोता है।
फूलों जैसी खुश्बू आ जाती है काँटों में ,
आम मिल जाते उसे जो बबूल बोता है।
बातों ही बातों में बन जाते हैं अफ़साने,
सब कुछ पाकर -वो सब कुछ खोता है।
कोहराम मच जाता है जब आँगन में,
इन्सां दुखः को अपने कंधों पे ढोता है।
मुआफ़िक हैं ये बहतीं शर्द हवाएँ ,
सूरज भी आसमान ओढ़ के सोता है।
कोहनूर पकेंगे अब हमारे खेतों में,
बहुत दिनों बाद ,मैंने हल जोता है.
***
-'कान्त'
कभी कभी जहाँ में ऐसा भी होता है,
लयला मिलने पर भी मजनू रोता है।
फूलों जैसी खुश्बू आ जाती है काँटों में ,
आम मिल जाते उसे जो बबूल बोता है।
बातों ही बातों में बन जाते हैं अफ़साने,
सब कुछ पाकर -वो सब कुछ खोता है।
कोहराम मच जाता है जब आँगन में,
इन्सां दुखः को अपने कंधों पे ढोता है।
मुआफ़िक हैं ये बहतीं शर्द हवाएँ ,
सूरज भी आसमान ओढ़ के सोता है।
कोहनूर पकेंगे अब हमारे खेतों में,
बहुत दिनों बाद ,मैंने हल जोता है.
***
-'कान्त'
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