Wednesday, 1 March 2017

तारक  महेता !

उल्टा  चश्मा  पहनाकर ,चले गए तारक महेता !
हम   सबको  हँसाकर , चले  गए तारक  महेता !

निरतिशय  मान -सम्मान  मिला  गुजराती को,
गुर्जरी को ऊँचे  उठाकर,चले गए  तारक महेता ! 

मुनशी  की  तरह, किरदारों  को  जीवित  किया,
मृत्यु  की  बेंड  बजाकर, चले  गए तारक महेता !

जेठालाल-दया बहन -टपु सेना   के   थे  सर्जक,
खिचड़ी  में घी मिलाकर,चले गए तारक  महेता !

उनकी  लेखिनी   विन्यास ,विनोद-विनीत  था,
'कान्त', खिलखिलाकर, चले गए तारक महेता !
                             ***




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