Wednesday, 8 March 2017

ग़ज़ल 

अपने  ज़ख्मों  को  सज़ा  के रखा है,
दुश्मनों को सीने से लगा के रखा है। 

सिसकियाँ   अच्छी   नहीं    लगतीं ,
आँखों  को  हरदम  हँसा के रखा  है। 

दिल  पे   कोई  दस्तक़  दे  या न दे,
हमने  तो  लैला को बिठा के रखा है। 

उजालों ने ,दामन छोड़ दिया कब से ,
अँधेरों  को   भीतर  मना के रखा  है। 

अय  सितारो, असीरों  से   कह   दो,
चाँद    को  छत  पे बुला   के रखा है। 

क्यों  रो  रही   हो  रेल   में    बैठकर ?
हमने  हाथ  हवा  में,हिला के रखा है। 

इस नशे का उतरना अब मुश्किल है,
मयकदे  को   ही   पिला  के  रखा है। 
                      ***
-'कान्त'









No comments:

Post a Comment