ग़ज़ल
अपने ज़ख्मों को सज़ा के रखा है,
दुश्मनों को सीने से लगा के रखा है।
सिसकियाँ अच्छी नहीं लगतीं ,
आँखों को हरदम हँसा के रखा है।
दिल पे कोई दस्तक़ दे या न दे,
हमने तो लैला को बिठा के रखा है।
उजालों ने ,दामन छोड़ दिया कब से ,
अँधेरों को भीतर मना के रखा है।
अय सितारो, असीरों से कह दो,
चाँद को छत पे बुला के रखा है।
क्यों रो रही हो रेल में बैठकर ?
हमने हाथ हवा में,हिला के रखा है।
इस नशे का उतरना अब मुश्किल है,
मयकदे को ही पिला के रखा है।
***
-'कान्त'
अपने ज़ख्मों को सज़ा के रखा है,
दुश्मनों को सीने से लगा के रखा है।
सिसकियाँ अच्छी नहीं लगतीं ,
आँखों को हरदम हँसा के रखा है।
दिल पे कोई दस्तक़ दे या न दे,
हमने तो लैला को बिठा के रखा है।
उजालों ने ,दामन छोड़ दिया कब से ,
अँधेरों को भीतर मना के रखा है।
अय सितारो, असीरों से कह दो,
चाँद को छत पे बुला के रखा है।
क्यों रो रही हो रेल में बैठकर ?
हमने हाथ हवा में,हिला के रखा है।
इस नशे का उतरना अब मुश्किल है,
मयकदे को ही पिला के रखा है।
***
-'कान्त'
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