ग़ज़ल
मैं अग्निपथ पे चलता हूँ ,
अपने साँचे में ढलता हूँ.
पल पल जीने की कोशिश में,
मरीचिका के पीछे मरता हूँ.
मुझ से पूछो,डुब्बी का मतलब,
बीच भँवर में, निकलता हूँ.
दर्द किसीका आँखों में भरकर,
पलकों से अविरत बहता हूँ.
किसे पुकारूँ ,किसे आवाज़ दूँ ?
प्रतिध्वनि से मैं डरता हूँ.
आस्तीन में छिपकर डसते जो,
मैं उनको ही पाला करता हूँ.
नफ़रत को इश्क में बदलूँगा,
फ़िरदौस में रोज मचलता हूँ.
***
-'कान्त'
मैं अग्निपथ पे चलता हूँ ,
अपने साँचे में ढलता हूँ.
पल पल जीने की कोशिश में,
मरीचिका के पीछे मरता हूँ.
मुझ से पूछो,डुब्बी का मतलब,
बीच भँवर में, निकलता हूँ.
दर्द किसीका आँखों में भरकर,
पलकों से अविरत बहता हूँ.
किसे पुकारूँ ,किसे आवाज़ दूँ ?
प्रतिध्वनि से मैं डरता हूँ.
आस्तीन में छिपकर डसते जो,
मैं उनको ही पाला करता हूँ.
नफ़रत को इश्क में बदलूँगा,
फ़िरदौस में रोज मचलता हूँ.
***
-'कान्त'
No comments:
Post a Comment