गीत
मैं कवि हूँ ,कविता है मेरी साथी
प्रीत मेरी शरमाती !
खुद को लेकर चलूं युगों से,
मरुस्थल का मैं हूँ राही !
अरमान सभी शब्दों में रह गए,
लेखिनी की खत्म हो गई स्याही !
मैं उजाला पूर्णिमा का,
रात मुझे सहलाती !
मैं सपनों की बहती सरिता,
जिसका नहीं किनारा !
अनबोली भाषा का हूँ मैं ,
नटखट शा इशारा !
मैं सर्जक हूँ गीत ग़ज़ल का,
शबनम मुझे नहलाती !
रचना मेरी ,बहे नदी बन,
मयूर पपीहों से खेले !
ध्वनि जब आये पलटकर,
इशारों को वो झेले !
हवा उन्हीं का प्यार चुराकर,
इतनी क्यों इठलाती ?
कुछ ऐसे जो, अवतरित हुए,
मेरी ही कलम से !
मुझको ही रुलाने लगे,
इक उदास नझम से !
है याद उन्ही की ,
जो घाव मेरे सहलाती !
मैं कवि हूँ ,कविता है मेरी साथी
प्रीत मेरी शरमाती !
***
-'कान्त'
मैं कवि हूँ ,कविता है मेरी साथी
प्रीत मेरी शरमाती !
खुद को लेकर चलूं युगों से,
मरुस्थल का मैं हूँ राही !
अरमान सभी शब्दों में रह गए,
लेखिनी की खत्म हो गई स्याही !
मैं उजाला पूर्णिमा का,
रात मुझे सहलाती !
मैं सपनों की बहती सरिता,
जिसका नहीं किनारा !
अनबोली भाषा का हूँ मैं ,
नटखट शा इशारा !
मैं सर्जक हूँ गीत ग़ज़ल का,
शबनम मुझे नहलाती !
रचना मेरी ,बहे नदी बन,
मयूर पपीहों से खेले !
ध्वनि जब आये पलटकर,
इशारों को वो झेले !
हवा उन्हीं का प्यार चुराकर,
इतनी क्यों इठलाती ?
कुछ ऐसे जो, अवतरित हुए,
मेरी ही कलम से !
मुझको ही रुलाने लगे,
इक उदास नझम से !
है याद उन्ही की ,
जो घाव मेरे सहलाती !
मैं कवि हूँ ,कविता है मेरी साथी
प्रीत मेरी शरमाती !
***
-'कान्त'
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