Sunday, 19 March 2017

गीत  

मैं  कवि   हूँ ,कविता  है  मेरी  साथी  
प्रीत  मेरी  शरमाती  !

खुद  को  लेकर  चलूं  युगों  से,
मरुस्थल  का  मैं  हूँ  राही !
अरमान  सभी  शब्दों में  रह गए,
लेखिनी  की  खत्म  हो  गई  स्याही  !

मैं   उजाला  पूर्णिमा  का,
रात  मुझे  सहलाती !


मैं  सपनों  की  बहती  सरिता,
जिसका नहीं किनारा !
अनबोली  भाषा का हूँ  मैं ,
नटखट  शा  इशारा !

मैं   सर्जक हूँ गीत ग़ज़ल का,
शबनम  मुझे  नहलाती !

रचना मेरी ,बहे  नदी  बन,
मयूर  पपीहों  से  खेले  !
ध्वनि  जब  आये  पलटकर,
इशारों  को  वो  झेले !

हवा  उन्हीं  का प्यार चुराकर,
इतनी  क्यों   इठलाती  ?

कुछ  ऐसे  जो, अवतरित  हुए,
मेरी   ही   कलम   से !
मुझको  ही  रुलाने   लगे,
इक  उदास  नझम  से !

है  याद  उन्ही  की ,
जो  घाव  मेरे सहलाती  !

मैं  कवि  हूँ ,कविता है मेरी  साथी 
प्रीत मेरी  शरमाती  !
              ***
-'कान्त'







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