Saturday, 23 July 2016

ग़ज़ल 

आज़  जी उदास  है , आँखें  भी   हैं   नम ,
जाने  क्यूँ   सता  रहे   हैं  ढ़ेर  सारे  गम। 

लगता    है  इलाही   ने  मुँह  मोड़  लिया ,
अब तक  इन  ताकतों में न था कोई दम। 

रंजिशें  सता  रही   हैं  जी  जान लगाकर,
जेहन में  फट रहे   हैं  फ़टाफ़ट एटमबम। 

सबकुछ  क़ुबूल, पर  इतना   जुल्म  क्यूँ  ?
अब   तक  जी   रहा  हुँ ,क्या वो  है कम ?

 मौजूदगी  मेरी   रब  को  न  रास   आई, 
आँसुओं   के   सैलाब  में   बह रहे हैं  हम। 
                         ***
-'कान्त'

















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