ग़ज़ल
आज़ जी उदास है , आँखें भी हैं नम ,
जाने क्यूँ सता रहे हैं ढ़ेर सारे गम।
लगता है इलाही ने मुँह मोड़ लिया ,
अब तक इन ताकतों में न था कोई दम।
रंजिशें सता रही हैं जी जान लगाकर,
जेहन में फट रहे हैं फ़टाफ़ट एटमबम।
सबकुछ क़ुबूल, पर इतना जुल्म क्यूँ ?
अब तक जी रहा हुँ ,क्या वो है कम ?
मौजूदगी मेरी रब को न रास आई,
आँसुओं के सैलाब में बह रहे हैं हम।
***
-'कान्त'
आज़ जी उदास है , आँखें भी हैं नम ,
जाने क्यूँ सता रहे हैं ढ़ेर सारे गम।
लगता है इलाही ने मुँह मोड़ लिया ,
अब तक इन ताकतों में न था कोई दम।
रंजिशें सता रही हैं जी जान लगाकर,
जेहन में फट रहे हैं फ़टाफ़ट एटमबम।
सबकुछ क़ुबूल, पर इतना जुल्म क्यूँ ?
अब तक जी रहा हुँ ,क्या वो है कम ?
मौजूदगी मेरी रब को न रास आई,
आँसुओं के सैलाब में बह रहे हैं हम।
***
-'कान्त'
No comments:
Post a Comment