Thursday, 14 July 2016

ग़ज़ल 

ख़ुदा  जब   हुश्न  देता  है,
नज़ाकत  आ ही  जाती है।  

दिया जब  रोशन होता है,
उसमें   जलती   बाती  है।  

हवाएँ जब सर्द चलती  हैं ,
खुद बहारें मुसकराती  हैं।  

नैनों  के कंवल  खिलते हैं ,
भँवरे की  गुंजन भाती  है। 

मैं   जहां   कदम  रख  दूँ , 
वहाँ   दहलीज़   आती  है। 

जब तुम से  रूठ जाता हूँ ,
ये  रातें  मुझे  मनातीं  हैं। 

'कांत' बात है  गर्मा  गर्म ,
मीठी   यादें   सताती   हैं। 
              ***
-'कान्त'















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