ग़ज़ल
ख़ुदा जब हुश्न देता है,
नज़ाकत आ ही जाती है।
दिया जब रोशन होता है,
उसमें जलती बाती है।
हवाएँ जब सर्द चलती हैं ,
खुद बहारें मुसकराती हैं।
नैनों के कंवल खिलते हैं ,
भँवरे की गुंजन भाती है।
मैं जहां कदम रख दूँ ,
वहाँ दहलीज़ आती है।
जब तुम से रूठ जाता हूँ ,
ये रातें मुझे मनातीं हैं।
'कांत' बात है गर्मा गर्म ,
मीठी यादें सताती हैं।
***
-'कान्त'
ख़ुदा जब हुश्न देता है,
नज़ाकत आ ही जाती है।
दिया जब रोशन होता है,
उसमें जलती बाती है।
हवाएँ जब सर्द चलती हैं ,
खुद बहारें मुसकराती हैं।
नैनों के कंवल खिलते हैं ,
भँवरे की गुंजन भाती है।
मैं जहां कदम रख दूँ ,
वहाँ दहलीज़ आती है।
जब तुम से रूठ जाता हूँ ,
ये रातें मुझे मनातीं हैं।
'कांत' बात है गर्मा गर्म ,
मीठी यादें सताती हैं।
***
-'कान्त'
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