ग़ज़ल
सपने सजते हैं ,सज के टूट जाते हैं ,
चाहनेवाले बीच रास्ते में छूट जाते हैं।
तड़पती है बुलबुल,अपने कैदखाने में,
बरसते बरसते ये आँसू भी रूठ जाते हैं।
सितारे चमकते रहते हैं ,आसमान पर,
चाँद - सूरज सारा उजाला लूंट जाते हैं।
हम इतनी उम्र में समज नहीं पाये,
शीशे की तरह, इंसान कैसे फूट जाते हैं ?
इस दुनिया से कोई क्या मांगे भला ?
तुम दंडवत करो,लोग चढ़ कूट जाते हैं।
***
-'कान्त'
सपने सजते हैं ,सज के टूट जाते हैं ,
चाहनेवाले बीच रास्ते में छूट जाते हैं।
तड़पती है बुलबुल,अपने कैदखाने में,
बरसते बरसते ये आँसू भी रूठ जाते हैं।
सितारे चमकते रहते हैं ,आसमान पर,
चाँद - सूरज सारा उजाला लूंट जाते हैं।
हम इतनी उम्र में समज नहीं पाये,
शीशे की तरह, इंसान कैसे फूट जाते हैं ?
इस दुनिया से कोई क्या मांगे भला ?
तुम दंडवत करो,लोग चढ़ कूट जाते हैं।
***
-'कान्त'
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