Monday, 4 July 2016

ग़ज़ल 

सपने  सजते   हैं   ,सज के टूट जाते  हैं ,
चाहनेवाले  बीच  रास्ते में  छूट जाते हैं। 

तड़पती  है  बुलबुल,अपने  कैदखाने में,
बरसते बरसते ये आँसू भी रूठ जाते हैं। 

सितारे चमकते  रहते हैं ,आसमान पर,
चाँद - सूरज सारा  उजाला लूंट जाते हैं। 

हम   इतनी   उम्र में  समज  नहीं पाये,
शीशे की तरह, इंसान कैसे फूट जाते हैं ?

इस  दुनिया  से  कोई  क्या  मांगे भला ?
तुम दंडवत करो,लोग चढ़ कूट जाते हैं। 
                         ***
-'कान्त'







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