Saturday, 13 May 2017

आँसू 

मेरी   आँख   के  आँसू  भी   बोलते  हैं ,
दुखः ,दर्द ,  सपनों    को  वे  तोलते हैं. 

गीत   के   भाव  सोते  गम के किनारे, 
कोई   तो    पहुंचेगें    वहाँ    थके-हारे. 

तकदीर  के  फ़साने,   यहाँ  डोलते  हैं ,
दुखः, दर्द,  सपनों   को   वे  तोलते हैं. 

ज्योति  में  क्यों  डूबते   हैं  ये सितारे ?
बे-असर  क्यों  हो गए ,प्राण के इशारे ?

मिल  चुके वे शून्य में,क्या खोजते हैं ?
दुखः, दर्द,  सपनों   को   वे  तोलते हैं. 

बोल किस लिए चलती पवन पुरवैया ?
मौसमों  के गीत का, कौन  है  गवैया ?

कौन  प्रहरी  हृदय  पट को, खोलते हैं ?
दुःख,  दर्द, सपनों    को  वे  तोलते  हैं. 

ध्यान रखना मौन  मेरा  टूट ना जाये ,
शायरी  का साथ  कभी छूट  ना  जाये. 

कलम  के  अरमान  मुझ में बोलते हैं ,
दुखः, दर्द, सपनों    को  वे  तोलते  हैं. 
                       ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '







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