Friday, 5 May 2017

बीते  कई  बरस  ...... !

कविता  के  अभ्यास  के ,
बीते  कई  बरस !
बंधु  'सांध्य दीप ' के साथ  के,
बीते कई  बरस !
हरे हरे  शब्द  तोड़  लिए इस  उपवन से,
तन  मन में  समा  गए,
गीत  इस  मधुबन  के !
होते  कठिन  प्रयास के ,
बीते कई  बरस !
ओस कणों  से  मुठ्ठी  भर ली
उस  में  से  कविताएँ  कर  लीं ,
कौए  को कोयल का स्वर दे कर 
सारी  ये  रचनाऐं  धर  लीं  !
ऐसे  मधुर मिलाप  के ,
बीते कई बरस !
'शब्द संहिता ' के  आँगन  में,
हम  इतने  समृद्ध  हुए,
आबिद  बन कर  रह  गए 
गीत-ग़ज़ल और तरन्नुम  के,
वो अटल  विश्वास के ,
बीते कई बरस !
बंधु  'सांध्य दीप ' के साथ के,
बीते कई  बरस !
                   ***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '




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