बीते कई बरस ...... !
कविता के अभ्यास के ,
बीते कई बरस !
बंधु 'सांध्य दीप ' के साथ के,
बीते कई बरस !
हरे हरे शब्द तोड़ लिए इस उपवन से,
तन मन में समा गए,
गीत इस मधुबन के !
होते कठिन प्रयास के ,
बीते कई बरस !
ओस कणों से मुठ्ठी भर ली
उस में से कविताएँ कर लीं ,
कौए को कोयल का स्वर दे कर
सारी ये रचनाऐं धर लीं !
ऐसे मधुर मिलाप के ,
बीते कई बरस !
'शब्द संहिता ' के आँगन में,
हम इतने समृद्ध हुए,
आबिद बन कर रह गए
गीत-ग़ज़ल और तरन्नुम के,
वो अटल विश्वास के ,
बीते कई बरस !
बंधु 'सांध्य दीप ' के साथ के,
बीते कई बरस !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
कविता के अभ्यास के ,
बीते कई बरस !
बंधु 'सांध्य दीप ' के साथ के,
बीते कई बरस !
हरे हरे शब्द तोड़ लिए इस उपवन से,
तन मन में समा गए,
गीत इस मधुबन के !
होते कठिन प्रयास के ,
बीते कई बरस !
ओस कणों से मुठ्ठी भर ली
उस में से कविताएँ कर लीं ,
कौए को कोयल का स्वर दे कर
सारी ये रचनाऐं धर लीं !
ऐसे मधुर मिलाप के ,
बीते कई बरस !
'शब्द संहिता ' के आँगन में,
हम इतने समृद्ध हुए,
आबिद बन कर रह गए
गीत-ग़ज़ल और तरन्नुम के,
वो अटल विश्वास के ,
बीते कई बरस !
बंधु 'सांध्य दीप ' के साथ के,
बीते कई बरस !
***
-कृष्णकांत भाटिया 'कान्त '
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